अगर जीवन के हर मोड़ पर होना है कामयाब तो कृष्ण को बना लीजिये अपने जीवन का सारथी.



नमस्कार दोस्तों,

दोस्तों, कृष्ण का पूरा जीवन यदि हम जाने और उससे सिख लें तो हमें हमारे जीवन के हर तकलीफ का सामना करने और उससे उबरने का रास्ता आसानी से मील सकता है. कृष्ण का पूरा जीवन मनुष्य के जीवन में आने वाली कठिनाइयों से उबरने के लिए मार्ग दर्शन करता है. कृष्ण मनुष्य को अपने जीवन से यह सिखाते हैं की जीवन कैसे जिया जाता है. उनके मार्गदर्शन में मनुष्य अपने जीवन काल में आने वाले हर महाभारत अर्थात कठिनाइयों को जीत सकता है. 
कृष्ण सिखाते हैं की मनुष्य को कब और किसके साथ कैसा व्यव्हार करना चाहिए. वे सिखाते हैं की मनुष्य को कब कैसा और कौनसा कर्म करना चाहिए. वे मनुष्य को अपने जीवन में आने वाले उतर चढाव से निपटने के लिए सही वक़्त पर सही फैसला करना सिखाते है. कृष्ण सिखाए हैं की मनुष्य को कभी भी किसी एक तयशुदा मापदंड पर बंध कर नहीं रहना चाहिए. मनुष्य को परिवर्तन शील होना चाहिए.
१. पितामह भीष्म के माध्यम से हमें कृष्ण यह सिखाते हैं.


इंसान को कभी भी किसी विशेष रस्म या कसमों बंध कर नहीं रहना चाहिए. कृष्ण ने महाभारत में अर्जुन को भीष्मपितामह पर प्रहार करने के लिए प्रेरित करते वक़्त बताया की कैसे भीष्म केवल अपनी प्रतिज्ञा को महत्व देकर निरंकुश हो गए जिस वजह से वे अपने परिवार के मुखिया होने का एक भी जिम्मेदारी नहीं निभा सके और अपने वंश के गुलाम बनकर रह गए. पितामह के माध्यम से कृष्ण यह सिखाते हैं की मनुष्य को कर्त्तव्य बद्ध होना चाहिए न की प्रतिज्ञा बद्ध. 
२. सुदामा के माध्यम से हमें कृष्ण यह सिखाते हैं.


कृष्ण और सुदामा की मित्रता से हमें यह सिख मिलती है की मनुष्य को अपने संबंधों को कभी भी अपने जीवन के ऊँचे या निचे स्तर से प्रभावित नहीं होने देना चाहिए. मनुष्य को चाहिए की वे अपने जीवन के दुःख या सुख अमीरी या गरीबी का प्रभाव किसी भी रिश्ते पर न पड़ने दे चाहे वह सम्बन्ध मित्रता का हो या फिर कोई और. 
३. कृष्ण के भगोड़े अर्थात रणछोड़ होने की कहानी से मिलने वाली सीख.


दोस्तों आप सभी ने कृष्ण की यह कहानी जरूर सुनी होगी की कैसे वे युद्ध छोड़कर भाग जाते हैं. पर जब हम इस कहानी के तह तक जाएंग तो हमें इस कहानी से कृष्ण यह शिक्षा देते हैं की मनुष्य को हमेशा जीवन मूल्यों को स्वयं के हार जीत या सम्मान से ऊँचा रखना चाहिए. मनुष्य को कभी भी स्वार्थी नहीं बनना चाहिए. आत्मसम्मान अर्थात स्वाभिमान अच्छी बात है पर कभी भी स्वयं पर अभिमान नहीं होना चाहिए. जब कृष्ण ने देखा की इस युद्ध में अनगिनत राज्य वासियों के प्राण संकट में पद सकते हैं तो उन्होंने अपनी प्रजा और बेकसूर राज्य के वासियों के जीवन के रक्षा के लिए स्व
यं का डरपोक और भगोड़ा कहलाना भी स्वीकार कर लिया और न केवल युद्ध छोड़ दिया बल्कि पुरे राज्य को ही सत्रु से छिपा कर दूसरी जगह बसा दिया. 
 ४. कृष्ण सिखाते हैं की मनुष्य को केवल वर्तमान में जीना चाहिए.
दोस्तों, कृष्ण अपने भगवतगीता के उपदेश में कहते हैं की, क्यों व्यर्थ की चिंता करते हो. तुम क्या लेकर आये थे जो खो गया. और तुम क्या लेकर जाओगे. जो हुआ अच्छा हुआ, जो हो रहा है वह भी अच्छा हो रहा है और आगे जो होगा वह भी अच्छा ही होगा. मनुष्य का ध्यान केवल अपने कर्म पर होना चाहिए उसके परिणाम पर नहीं. क्योंकि कर्म के प्रतिफल पर मनुष्य का नियंत्रण नहीं है.
 इस उपदेश से कृष्ण सिखाते हैं की आपके विचार आपके कर्म को प्रभावित करते हैं और कर्म उसके प्रतिफल को. यदि आप अतीत में हुए किसी कड़वे अनुभव को अपने मन में बिठा कर कोई कार्य करेंगे तो वह आपके आज को और आने वाले भविष्य को भी ख़राब कर देगा. मनुष्य को चाहिए की वह अतीत में मिली असफलता का दुःख मानाने के बजाये उसमे हुए गलतियों पर सुधर करते हुए पुनः प्रयाश करना चाहिए. मनुष्य को केवल अपने आज को संवारना चाहिए क्योंकि हमारे आज पर ही हमारा नियंत्रण है. कल क्या होगा यह हम तय नहीं कर सकते पर आज हम जो भी कार्य करेंगे उसका प्रभाव हमारे कल पर जरूर पड़ेगा.
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