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बसंतपंचमी 10 फ़रवरी 2019 : इस तरह कीजिये माँ सरस्वती को प्रसन्न।

नमश्कार दोस्तों,

दोस्तों, भारत देश अपनी विविधता के लिए जाना जाता है। यदि आप कोई भी भारतीय कैलेंडर देखें तो आपको पता चलेगा की भारत में हर एक दिन कोई न कोई व्रत या त्यौहार जरूर होता है। धरती पर प्राकृतिक सौन्दर्य बिखेरने और धरती का श्रृंगार करने वाले बसंत ऋतु का आगमन हो चूका है। बसंत ऋतु की पंचमी को बसंतपंचमी के रूप में मनाया जाता है। इस दिन का हिन्दू धर्म में खास महत्व है, बसंत पंचमी के दिन मान सरस्वती की पूजा की जाती है। इस वर्ष फ़रवरी की 10 तारीख दिन रविवार को बसंत पंचमी है। बसंत पंचमी के दिन सभी स्कूलों एवं घरों में माँ सरस्वती की पूजा होती है। जो लोग शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं या संगीत से जुड़ी किसी प्रकार की साधना कर रहे हैं उन सभी के लिए बसंत पंचमी बहोत खास महत्व होता है।

 

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आपको बता दें की इस दिन को प्रेम के देवता कामदेव की भी पूजा की जाती है। एक पौराणिक मान्यता के अनुसार बसंत को कामदेव का घनिष्ठ मित्र माना जाता है इसीलिए बसंतपंचमी के दिन कामदेव और उनकी पत्नी रति की पूजा की जाती है। इस दिन सुबह स्नान करके घर एवं पूजा स्थल को सुगन्धित एवं रंग बिरंगे पुष्प से सजाया जाता है। सर्वप्रथम भगवान गणेश की स्तुति करते हैं तत्पश्चात माँ सरस्वती एवं गणेश की पूजा की जाती है। सरस्वती पूजा के बाद बसंत के सौंदर्य की प्रशंसा करते हुए देवी रति एवं कामदेव की पूजा की जाती है।

 

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बसंत पंचमी के दिन भगवन विष्णु एवं शिव की पूजा का भी महत्व होता है। इस दिन भगवान विष्णु की प्रतिमा को शुद्ध जल या दूध से स्नान कराकर उन्हें पिले वस्त्र बी पहनाते हैं तत्पश्चात  विधिवत तरीके से या फिर पंडित की सलाह से भगवान विष्णु की आराधना करते हैं। बसंत पंचमी के दिन भारत के स्कूलों में बच्चों द्वारा रंगारंग कार्यक्रम की प्रस्तुति की जाती है। स्कूल प्रशासन द्वारा इस तरह के कार्यक्रमों के आयोजन का उद्देश्य होता है की बच्चों के भीतर की छुपी हुई प्रतिभा को पहचानकर निखारा जा सके और मंचीय प्रस्तुति के लिए उन्हें अभ्यस्त किया जा सके।

 

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25 December happy Christmas day : जानिये ईशु मसीह और क्रिसमस त्यौहार के बारे में .

नमस्कार दोस्तों,

दोस्तों, दुनिया भर में क्रिसमस त्यौहार की तैयारी पुरे जोरों शोरोंके साथ चल रही है। दोस्तों दुनिया भर में भारत देश एक धर्म निरपेक्ष देश के रूप में जाना जाता है। भारत ही एक मात्र ऐसा देश है जहां विभिन्न जाती धर्म और संप्रदाय के लोग ख़ुशी-ख़ुशी रहते हैं। दोस्तों जैसा की हम सभी जानते हैं की हर साल के 25 दिसंबर को हर ईसाई देश के साथ साथ भारत में भी क्रिसमस का त्यौहार बड़े ही जोर शोर के साथ मनाया जाता है। दोस्तों भारत में चार धर्म हिन्दू , मुश्लिम, सिक्ख और ईसाई इस देश को सम्हालने वाले चार स्तम्भ की तरह है जिसमे से हर किसी का एकसमान महत्व है। यही वजह है की क्रिसमस का त्यौहार सिर्फ एक धर्म की मान्यता मात्र नहीं बल्कि भारत के गौरवशाली इतिहास और इसकी अनेकता में एकता का सटीक उदाहरण भी है।

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आइये जानते हैं क्यों मनाया जाता है क्रिसमस का त्यौहार और हमारे ईसाई भाइयों के लिए इसका क्या धार्मिक महत्व है। 

क्रिसमस ईसाई धर्म के लोगों का प्रमुख पर्व है। यह पर्व पूरी दुनिया में फैले ईसा मसीह के करोड़ों अनुयाइयों के लिए पवित्रता और सम्पन्नता का सन्देश लेकर आता है। ईसाई धर्म में भगवान ( god ) माने जाने वाले प्रभु इशू की याद में यह क्रिसमस का पर्व प्रतिवर्ष 25 दिसंबर को मनाया जाता है। कहा जाता है की इसी दिन भगवान् ईसामसीह या जीसस क्राइस्ट का जन्म हुआ था। क्रिसमस पुरे विश्व में मनाए जाने वाले प्रमुख त्योहारों में से एक है। इस दिन के लिए  भारत सरकार की तरफ से एक दिवसीय छुट्टी घोषित की गई है ताकि देश की जनता इस धार्मिक पर्व को पूर्ण हर्ष -उल्लास एवं आपसी भाई चारे के साथ मना सके। इस दिन सभी सरकारी एवं गैरसरकारी स्कूल, कॉलेज एवं कार्यालय पूर्ण तया बंद रहते हैं।

क्रिसमस डे 25 दिसंबर 2018 : सभी ईसाई देशों में क्रिसमस की तैयारी एक महीने पूर्व ही शुरू कर दी जाती है। सभी ईसाई इस त्यौहार को 12 दिनों तक मनाते हैं। इस दिन को पूरी दुनिया में एक धार्मिक त्यौहार के रूप में मनाया जाता है। हर त्यौहार की तरह इस त्यौहार में भी छेत्रीय रंग जरूर दिखाई पड़ता है। देश, राज्य और स्थान के साथ त्यौहार मनाने का तरीका भी कुछ बदला हुआ प्रतीत होता है। इस दिन सभी ईसाई भाई अपने परिवार एवं रिश्तेदारों को पुरस्कार एवं क्रिसमस कार्ड बांटते हैं। परिजनों के बीच भोज का कार्य होता है। बच्चों को इस त्यौहार का बड़ी बेशब्री से इंतज़ार होता है। घर के बड़े बुज़ुर्ग सांताक्लॉज बनकर बच्चों को मनपसंद खिलौने और उपहार वितरण करते हैं।

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क्यों मनाया जाता है क्रिसमस का त्यौहार। 

आज के दिन महान ईसामसीह का जन्म हुआ था। क्रिसमस का त्यौहार महान ईसा मसीह की जयंती के रूप में मनाया जाता है। ईसा मसीह को ईसाई धर्म के लोग ईश्वर का पुत्र मानकर अपनी रिवाज़ों के अनुसार उनकी पूजा करते हैं। इस दिन को सभी ईसाई धर्म के अनुयाई एक सांस्कृतिक त्यौहार के रूप में मनाते है। लोग त्यौहार से पहले ही अपने घरों को फूलों से सजाते हैं। घर में क्रिसमस ट्री बनाकर उसे फूलों एवं सुंदर रंग बिरंगी लाइट्स से सजाते हैं। इस दिन प्रभु इशू के प्रतिक चिन्ह क्रॉस के आसपास कैंडल जलाकर उनको स्मरण किया जाता है।

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कल दिखेका साल 2018 का सबसे बड़ा चन्द्रमा, दर्शन करने से माता लक्ष्मी होगी प्रशन्न।

कल दिखेगा साल का सबसे बड़ा चंद्रमा, दर्शन करने से मिलेगी सुख समृद्धि, लक्ष्मी होगी प्रसन्न

नमस्कार दोस्तों,

कल 23 नवंबर 2018: कार्तिक पूर्णिमा की रात पर इस साल का सबसे बड़ा चन्द्रमा दिखाई देगा।  पूर्णिमा पर कृतिका नक्षत्र में परिधि योग बनने से कार्तिक पूर्णिमा का महत्व कई गुना बढ़ गया है।  कार्तिक पूर्णिमा को त्रिपुरी पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन गंगा नदी में स्नान करने का अलग महत्व है। माना जाता है की इस दिन गंगा में स्नान करने से पुरे साल स्नान करने के जितना पुण्य प्राप्त हो जाता है। कार्तिक पूर्णिमा पर कृतिका नक्षत्र और परिधि योग से छत्र योग बनेगा। इस योग में चन्द्रमा के दर्शन का काफी विशेष महत्व माना जाता है।

इस कार्तिक पूर्णिमा को जो चाँद निकलेगा वो साल का सबसे बड़ा चाँद होगा। इस दिन चन्द्रमा 180 अंश पर रहेगा। चन्द्रमा के उदय के समय छः कृतिकाओं शिवा, सम्भूति, संतति, अनुसुइया, प्राप्ति, एवं क्षमा का पूजन करने से शिव जी की कृपा की प्राप्ति होती है।

पंडितों और  ज्योतिषों  के अनुसार इस रात चाँद से निकलने वाली रौशनी अत्यधिक सकारात्मक ऊर्जा से भरी होती है। ये जातकों  के दिमाग पर काफी अच्छा असर डालती है। पूर्णिमा पर अपनी मानसिक ऊर्जा में वृद्धि करने के लिए चन्द्रमा को अर्ध्य देना चाहिए।  इस दिन सुख समृद्धि और संपत्ति पाने हेतु माता लक्ष्मी को प्रशन्न करने के लिए घर में पांच, ग्यारह या इक्कीस दिए जलाने चाहिए। इससे सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

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गुरुनानक साहब के इन नौ उपदेशों को अपने जीवन में धारण करने से दूर रहती है हर मुसीबत।

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इक ओंकार मंत्र से नानक ने दिया ये संदेश 

अपने इस मंत्र से गुरु नानक ने लोगों को ईश्वर के एक होने का संदेश दिया। उनका कहना था कि ईश्वर सब जगह मौजूद है। वह हमारा पिता है इसलिए सबको प्रेम के साथ रहना चाहिए। 
धन कैसे कमाएं

लोभ को त्याग कर व्यक्ति को खुद बहुत मेहनत करके सही तरीके से धन अर्जित करना चाहिए। 
 
हक नहीं छीनना चाहिए

नानक कहते थे कभी भी किसी का हक नहीं छीनना चाहिए। इसके विपरीत कड़ी मेहनत और ईमानदारी के साथ की हुई कमाई से जरूरतमंदों की भी मदद करनी चाहिए।   
 
पैसों को इस जगह बिल्कुल ना रखें

नानक कहते हैं कि धन को हमेशा अपनी जेब तक ही सीमित रखें। उसे कभी भी अपने दिल में जगह नहीं देनी चाहिए। ऐसा ना करने पर व्यक्ति को हमेशा नुकसान ही उठाना पड़ता है। 
 
स्त्रियों के बारे में ये कहना था नानक का

नानक हमेशा स्त्रियों का आदर करने की सलाह देते रहे। उनके अनुसार स्त्रीपुरुष सभी एक समान थे। 
 
काम कैसे करना चाहिए

नानक के अनुसार व्यक्ति को हमेशा तनावमुक्त रहकर निरंतर अपने कर्म करते रहने चाहिए। ऐसा करने से वह हमेशा प्रसन्न बना रहता है।
 
दुनिया को जीतने का मंत्र

नानक कहते थे कि दुनिया को जीतने से पहले व्यक्ति को अपने विकारों और बुराईयों पर विजय पाना बेहद जरूरी है। तभी वह दुनिया को जीत सकता है। 
 
शत्रु पर विजय पाने का मंत्र

अहंकार मनुष्य का सबसे बड़ा दुश्मन होता है। नानक कहते थे इसलिए व्यक्ति को कभी भी अहंकार नहीं करना चाहिए। सब लोगों से विनम्र होकर बात करनी चाहिए। 
 
जातिवाद को मिटाने पर जोर

गुरु नानक देव ने हमेशा अपने प्रवचनों से जातिवाद को मिटाने के उपदेश दिए हैं। इसके अलावा उन्होंने अपने विचारों में हमेशा लोगों को सत्य के मार्ग पर चलने की सीख दी है। 
 
जिस किसी ने भी गुरुनानक जी के इन उपदेशों को अपने जीवन में उतार लिया वो अपने जीवन में आने वाली हर मुसीबत से आसानी से अपनी बुद्धि के दम पर  खुद ही निपट लेने में सक्षम हो जाता है। गुरुनानक बताये मार्गदर्शन में चलने वाला मनुष्य अपने जीवन पथ से कभी नहीं भटकता और अपनी मंज़िल को ज़रूर प्राप्त करता है। 

पैगंबर हजरत मोहम्मद के जन्मदिवस पर पढ़ें उनके खास उपदेश

Eid-E-Milad 2018: पैगंबर हजरत मोहम्मद के जन्मदिवस पर पढ़ें उनके खास उपदेश

नमस्कार दोस्तों,

दोस्तों आज ईद मुलादुद्दीन नबी याने की  ईदे मिलाद है। आज  इस्लाम के पैगम्बर हजरत मोहम्मद  का जन्म दिन है। पैगम्बर मोहम्मद  के जन्म दिन को ही ईदे मिलाद  के  रूप में मनाया जाता है। इस्लामिक कैलेंडर के मुताबिक इस्लाम के तीसरे महीने रबी-अल-अव्वल की १२वी तारीख, 571ई. के दिन ही इस्लाम के सबसे  महान नबी और आखरी पैगम्बर का जन्म हुआ था. जो अंग्रेजी कैलेंडर  के अनुसार 2018 में 21 नवंबर को है। उनकी जन्म की खुशी में मुस्लिम, मस्जिदों में नमाज़ अदा करते हैं। रात भर मोहम्मद को याद करके इबादत करते हैं और जुलूस निकालते हैं। इसके साथ ही पैगंम्बर मोहम्मद की दी गई शिक्षाओं और पैगामों को पढ़ा जाता है। पैगम्बर हज़रात मोहम्मद ने ही इस्लाम धर्म की पवित्र किताब कुरान  शिक्षाओं का  उपदेश दिया था।

आइये उनके  जन्म दिवस और ईद मीलउद्दीन नबी के इस पाक अवसर पर उनके द्वारा दी गई कुछ महान उपदेशों को पढ़ें।

1. सबसे अच्छा आदमी वही है जिससे मानवता की भलाई होती है। 
2. जो ज्ञान का आदर करता है वह मेरा आदर करता है। 
3. विद्वान के कलम की स्याही शहीद के खून से ज्यादा  पाक है। 
4. अत्यधिक ज्ञान अत्यधिक इबादत से बेहतर है। 
5. अज्ञानियों के बीच ज्ञान को ढूंढने वाला वैसा ही है जैसे मुर्दों के बीच ज़िंदा। 
6. ज्ञानियों के साथ बैठना भी इबादत है। 
7. मज़दूर का नेहनताना उसके पसीने के सूखने से पहले मिल  चाहिए। 
8. वह आदमी जन्नत में दाखिल नहीं हो सकता जिसके दिल में घम्मंड का एक कण भी मौजूद है। 
9. जिसके पास एक दिन और एक रात का भोजन हो उसे भीख नहीं मांगना चाहिए। 
10 . सबसे अच्छा  मुसलमान घर वह है जहां यतीम पलता है, और सबसे बुरा मुसलमान  घर वह है  यतीम           पर ज़ुल्म होता है। 
11 . भूखे को खाना दो, बीमार की देखभाल करो अगर कोई अनुचित रूप से बंदी बनाया गया है तो उसे मुक्त           करो आफत के मारे प्रत्येक व्यक्ति की सहायता करो भले ही वह मुसलमान हो या गैर मुस्लिम।
12 . जो ज्ञान की खोज में घर-बार छोड़ देता है वह अल्लाह के रास्ते पर चलता है यहां तक के वह वापस लौटे।

जय गणेश देवा. शुभता के प्रतिक गणेश, पर कब तक?

नमस्कार दोस्तों, 
मित्रों जब हम कोई भी नया काम शुरू करते हैं तो हम उसे श्रीगणेश करना कहते हैं , दोस्तों जब भी कोई शुभ कार्य करना हो तो हम भगवान् गणेश को याद कर और उनका नाम लेकर शुरू करना ज्यादा शुभ समझते हैं. जब हम घर में कोई भी धार्मिक कार्य करते हैं तो सभी देवों से पहले श्री गणेश की पूजा करते हैं. और आप सभी ने शायद गौर नहीं किया हो पर जब हम उनका नाम या मन्त्र पढ़ते हैं तो सामने श्री लगते हैं. जैसे श्री गणेश या श्री गणेशाय नमः. दोस्तों यहाँ जो श्री लगा है वह हम जो किसी व्यक्ति को सम्बोधित करने के लिए जो श्री लगाते है वह श्री नहीं बल्कि स्वयं माँ लक्ष्मी का नाम है.
आप सभी ने उस घटना का जिक्र तो सुना ही होगा जब भगवान् गणेश के पिता स्वयं शिव जी ने उनका सर, धड़ से अलग कर दिया था. पर माता पार्वती का प्रलाप सुनकर और उनका रौद्र रूप देखकर सब डर गए क्योंकि माता पार्वती ने अपने क्रोध से पुरे ब्रम्हांड का अंत कर देने की ठान ली थी.

 

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जिसने पूरी सृष्टि को जन्म दिया अगर वही उसका अंत करना चाहे तो भला उसे कौन रोक पाता. इसलिए माता पार्वती का क्रोध शांत करने के लिए भगवन शिव ने गजराज का शीश काटकर गणेश जी पर लगा दिया और उन्हें पुनः जीवित कर दिया. साथ में सभी देवताओं ने उन्हें प्रथम पूज्य होने का आशीर्वाद दिया. और कहा की जहा भी किसी भी तरह का शुभ कार्य या पूजा पाठ होगा वहां सबसे पहले गणेश की आरती होनी आवश्यक होगी. अन्यथा किसी को भी उस सुबह कार्य का सुबह फल नहीं मिलेगा. उसी समय माँ लक्ष्मी ने कहा की वो हमेशा गणेश के साथ पूजी जाएंगी और जो भी गणेश के सात उनकी पूजा करेगा उसे धन संपत्ति और सम्पन्नता प्रदान करेंगी. इसीलिए गणेश के नाम के आगे माता लक्ष्मी का नाम श्री लगता है.
दोस्तों हम सभी गणेश चतुर्थी से लेकर अगले ग्यारह दिन तक उनकी भाव भक्ति में डूबे रहते हैं. और ग्यारहवे दिन श्री गणेश जी को नदी या तालाब में विषर्जित कर देते हैं. पर दोस्तों वर्त्तमान शमय में जल संसाधन काफी कम और अशुद्ध हो चूका है. और श्री गणेश जी की मूर्ति बनाने में भी काफी विषैले केमिकल का उपयोग किया जाता है.
जब गणेश स्थापना की शुरुवात हुई तो इसका उद्देश्य लोगों एक करना था. इसलिए एक गाँव या शहर के किसी एक विशेष स्थान पर केवल एक ही गणेश की स्थापना की जाती थी वह भी शुद्ध मिटटी और प्राकृतिक रंगों से बानी हुई पर अब ऐसा नहीं है. अब विभिन्न केमिकल युक्त विषैले रंगों का उपयोग किया जाता है और मिटटी के जगह प्लास्टर ऑफ़ पैरिश का उपयोग किया जाता है. जो की पानी में आसानी से नहीं घुलता बल्कि काफी समय तक नदी और तालाब में तैरता रहता है. विषैले रंग पानी में मिलकर पानी को विषैला बना देते हैं तथा उस पानी में रहने वाले जीवों एवं उपयोग करने वाले लोगों की त्वचा और आँखों को काफी नुक्सान पहुंचते हैं. कई बार तो यह कैंसर जैसी गंभीर बीमारी का भी कारन बनते हैं.
अब आप ही बताइये की आप गणेश जी को अपने घर किसलिए स्थापित करते हैं . शुभता के लिए या रोग आमंत्रित करने के लिए. पर दोस्तों इसमें गणेश जी का नहीं दोष हमारा है. घर घर में गणेश बैठकर हम गणेश पर्व के मूल उद्देश्य को ही खंडित कर रहे हैं. बेहतर है की कम से कम एक हजार लोगों के बिच एक गणेश मूर्ति बैठायी जाये. और मूर्ति शुद्ध मिटटी की बनी है या नहीं इसकी पड़ताल कर लें. कोशिश करें की मूर्ति केवल नदी में ही विषर्जित हो.
सबसे खास बात यह है की मूर्ति विषर्जन शांत स्वाभ
ाव से हो. हुड़दंग बाज़ी करके, शोर मचाकर और नशाखोरी करके नहीं. जैसा की आजकल आमबात हो गया है. दोस्तों क्या आपको नहीं लगता की ऐसा असामाजिक कार्य करके हम गणेश जी को नाराज कर लेते हैं. और फिर हम कोशते हैं की गणेश जी ने इतना पूजा पाठ करने के बाद भी हमें कुछ नहीं दिया. तो दोस्तों एक बार मेरी इस बात पे गौर जरूर कीजियेगा. धन्यवाद्.

सबरीमाला : भारी विरोध के चलते वापिस लौटेंगी तृप्ति देसाई.

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नमस्कार दोस्तों, 
दोस्तों, सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के द्वारा पौराणिक मान्यता को चुनौती देते हुए मंदिर में प्रवेश की भरषक कोशिश और भक्तों एवं मंदिर प्रशासन के द्वारा हो रहे विरोध के बीच, आज शाम ५ बजे एक बार फिर केरल के प्रसिद्ध सबरीमाला मंदिर के कपाट दर्शन के लिए खोल दिए गए. हिंदूवादी प्रदर्शनकारियों के भरी विरोध के बीच केरल के चर्चित सबरीमाला मंदिर में दर्शन के लिए पहुंची सामजिक कार्यकर्ता तृप्ति देसाई और उनके साथ छः अन्य महिलाओं ने हवाईअड्डे पर से पुणे लौटने का फैसला किया है. तृप्ति और उनके साथ आये अन्य महिलाओं का समूह आज शुक्रवार को लगभग 4 बजकर 45 मिनट पर यहाँ पंहुचा था. उनके आने के बाद बीजेपी और संघ परिवार के कार्यकर्ता हवाईअड्डे के बाहर ही प्रदर्शन करने लगे, इसलिए उनकी सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए पुलिस ने उन्हें हवाईअड्डे पर ही रोक लिया. और वे हवाईअड्डे से बाहर नहीं निकल पाई.
हम आपको बता दें की जब भूमाता ब्रिगेड की मुखिया तृप्ति देसाई यहाँ अन्य छः महिलाओं के एक दाल के साथ पहुंची, तब यहाँ केवल १०० प्रदर्शनकरि थे, लेकिन बाद में यह संख्या बढ़कर हजारों की भीड़ में बदल गई और प्रदर्शनकारीयो ने हवाईअड्डे के अंदर और बाहर सभी द्वारों पर डेरा जमा लिया. बीजेपी के वरिष्ठ नेता भी हवाईअड्डे पर पहुंच गए. तृप्ति देसाई के बढ़ते विरोध को देखकर पुलिस वालों उन्हें वापिस चले जाने को कहा. बीजेपी प्रवक्ता सोभा सुरेंद्रन ने भी कहा, ‘हमें उन्हें यहाँ से जाने के लिए कहना होगा, क्योंकि हम उन्हें यहाँ से बाहर जाने की इजाजत नहीं दे सकते. तृप्ति देसाई को हमारे मुख्यमंत्री के जैसे नास्तिकों का समर्थन हासिल है जो हर हल में महिलाओं के मंदिर में प्रवेश को देखने के लिए प्रतिबद्ध हैं.’
निजी पब्लिसिटी के लिए किसी को भी पौराणिक परम्पराओं का इस तरह से उल्लंघन नहीं करना चाहिए जिससे लोगों की धार्मिक भावना को ठेस पहुंचे. सबरीमाला में महिलाओं का प्रवेश एक धार्मिक परंपरा है और लोगों के धार्मिक आस्था पर कानूनी बेड़ियाँ लगाना सही नहीं. 
दोस्तों, यदि आप सभी को मेरा यह पोस्ट पसंद आया हो तो कृपया मुझे फॉलो जरूर कीजियेगा. और अपना भहुमुल्य कमेंट करना न भूलें. धन्यवाद्.

आइये जानते हैं क्या है सबरीमाला मंदिर से जुड़ा विवाद.

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नमस्कार दोस्तों,
दोस्तों, हम आपको बता दें की महिलाओं के प्रवेश को लेकर विवादों में घिरी सबरीमाला मंदिर के कपाट शुक्रवार 16 तारीख की शाम पांच बजे पारम्परिक मासिक पूजा के लिए खोल दिए गए. मंदिर परिसर के बाहर विरोध-प्रदर्शन और तनाव की स्थिति को देखते हुए पुलिस प्रशासन अलर्ट पर है. मंदिर परिसर के आस पास काफी मात्रा में पुलिस बल तैनात कर दिया गया है. सुप्रीम कोर्ट द्वारा हर उम्र की महिलाओं को मंदिर प्रवेश की अनुमति दे दी गई है. जबकि सुप्रीम कोर्ट ने इससे पूर्व 10 से 50 वर्ष के उम्र की महिलाओं को प्रवेश की अनुमति नहीं थी. अर्थात केवल 10 वर्ष से कम उम्र की बच्चियों और 50 से साधिक उम्र की बुज़ुर्ग महिलाओं को ही प्रवेश की अनुमति थी. या सीधे शब्दों में कहा जाए तो केवल उन्ही महिलाओं को मंदिर में प्रवेश की अनुमति थी जो की माहवारी के दायरे में नहीं आते थे.
आइये जानते हैं क्या है सबरीमाला मंदिर से जुड़ा यह विवाद.
साल 2006 में मंदिर के मुख्या ज्योतिष परपपनगडी उन्नीकृष्णन ने मंदिर ट्रस्ट के सभी सदस्यों के सामने यह बात कही थी की मंदिर में स्थापित अयप्पा अपनी ताकत खो रहे हैं और वह इसलिए नाराज़ हैं क्योंकि मंदिर में किसी युवा महिला ने प्रवेश किया है. इसके बाद ही कन्नड़ अभिनेता प्रभाकर की पत्नी जयमाला ने दवा किया था की उन्होंने अयप्पा की मूर्ति को छुआ और उनकी वजह से अयप्पा नाराज़ हुए. उन्होंने अपनी भूत स्वीकारते हुए कहा की वे इस गलती की प्रायश्चित करना चाहती है. अभिनेत्री जयमाला ने दावा किया था कि 1987 में अपने पति के साथ जब वे मंदिर में दर्शन करने गई थी तो भीड़ कि वजह से धक्का लगने कि वजह से वे गर्भगृह पहुंच गई और भगवन अयप्पा के चरणों में गिर गई. जयमाला का कहना था कि वहां पुजारी ने उन्हें फूल भी दिए थे.
सुप्रीम कोर्ट में दायर हुई थी याचिका
अभिनेत्री जयमाला के द्वारा अयप्पा को स्पर्श करने के दावे के बाद मंदिर में महिलाओं का प्रवेश वर्जित होने के इस मुद्दे पर लोगों का ध्यान गया. 2006 में राज्य के यंग लॉयर्स असोसिएशन ने सुप्रीम कोर्ट में इसके खिलाफ याचिका दायर कि. इसके बावजूद अगले दस सालों तक महिलाओं के सबरीमाला मंदिर में प्रवेश का मामला कोर्ट में अटका रहा.
सुप्रीम कोर्ट ने किया था हस्तक्षेप
सबरीमाला मंदिर मामले में मिली याचिका पर कोर्ट ने मंदिर के ट्रस्ट त्रावणकोर देवासम बोर्ड से महिलाओं को मंदिर प्रवेश कि अनुमति न देने पर जवाब तालाब किया. बोर्ड ने अपना पक्ष रखते हुए कहा था कि भगवान् अयप्पा ब्रम्हचारी थे और इस वजह से मंदिर में वही बच्चियां एवं महिलाऐं प्रवेश कर सकती हैं, जिनका मासिक धर्म शुरू न हुआ हो या फिर ख़त्म हो चूका हो. ७ नवम्बर 2017 को सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में सुनवाई करते हुए कहा था कि वह सबरीमाला मंदिर में हर उम्र कि महिलाओं को प्रवेश देने के पक्ष में है.
सबरीमाला मुद्दे पर खूब हुई राजनीति
जबसे सबरीमाला मामले का उजागर हुआ है तभी से सभी राजनैतिक पार्टी इस मामले पर अपनी राजनीति कर रहे हैं. साल 2006 में मंदिर में प्रवेश कि अनुमति से जुड़ी एक याचिका दायर किये जाने के बाद 2007 में एलडीएफ सरकार ने प्रगतिशील व सकारात्मक नजरिया दिखाया था. एलडीएफ के रुख से उलट कांग्रेस नेतृत्व वाली यूडीएफ सरकार ने बाद में अपना पक्ष बदल दिया था. चुनाव हरने के बाद यूडीएफ सरकार ने कहा था कि वह सबरीमाला में १० से ५० वर्ष वर्ष कि आयु वाली
महिलाओं के प्रवेश के खिलाफ हैं. यूडीएफ का तर्क था कि यह परंपरा १५०० साल से चली आ रही है. बीजेपी ने इस मुद्दे को दक्षिण में पेअर ज़माने के मौके कि तरह देखा और बीते दिनों सुप्रीम कोर्ट के महिलाओं के हक़ में आये फैसले के विरोध में हजारों बीजेपी कार्यकर्ताओं ने केरल राज्य सचिवालय कि और मार्च किया. महिला अधिकार संगठनों ने इसे मुद्दा बनाया साथ ही भूमाता ब्रिगेड कि तृप्ति देसाई ने भी सबरीमाला मंदिर आणि कि बात कही. 
कोर्ट ने माना महिलाओं के मौलिक अधिकार का उल्लंघन.
महिलाओं के मंदिर प्रवेश पर रोक के इस मामले पर ११ जुलाई २०१६ को सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह मामला संवैधानिक पीठ को भेजा जा सकता है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि ऐसा इसलिए जरुरी है क्योंकि यह संविधान द्वारा दिए गए मौलिक अधिकारों के उल्लंघन का मामला है और इन अधिकारों के मुताबिक महिलाओं को प्रवेश से रोका नहीं जाना चाहिए. 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने मामला संविधान पीठ को सौंप दिया था और जुलाई, २०१८ में पांच जजों कि एक बेंच ने मामले कि सुनवाई शुरू कि थी.
महिलाओं के हक में आया ऐतिहासिक फैसला
इसी साल २८ सितम्बर को सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासि फैसला सुनते हुए केरल के सबरीमाला मंदिर में महिलाओं को प्रवेश कि अनुमति दे दी है. कोर्ट ने साफ़ कहा है कि हर उम्र वर्ग कि महिलाएं अब मंदिर में प्रवेश कर सकती हैं. सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि हमारी संस्कृति में महिलाओं का स्थान आदरणीय है. यहां महिलाओं को देवी कि तरह पूजा जाता है और मंदिर में प्रवेश से रोका जा रहा है. पुरुष प्रधान समाज कि इस दोगली मानसिकता को स्वीकारा नहीं जा सकता.

यहाँ से जानिये वृंदा से तुलसी बनने की पूरी कथा और धार्मिक महत्व.

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नमस्कार दोस्तों,
दोस्तों, भारत में शायद ही कोई ऐसा हिन्दू घर, मंदिर या अन्य कोई धार्मिक स्थल होगा जहां के आँगन में तुलसी का पौधा न हो. घर-घर में पूजी जाने वाली तुलसी परम पावन और पवित्र मानी जाती है. भगवान विष्णु अपना भोग तुलसी पत्र के बिना स्वीकार नहीं करते. आखिर क्यों है तुलसी का इतना महत्व. कहाँ से आया और कैसे हुई तुलसी के पौधे की उत्पत्ति. आइये जानते हैं इसकी पौराणिक कथा.
पौराणिक काल में एक वृंदा नाम की लड़की थी. वृंदा का जन्म राक्षस कुल में हुआ था. राक्षस कुल में जन्म होने के बावजूद वृंदा भगवान विष्णु की परम भक्त थी. वह बड़े ही भक्ति भाव से भगवान विष्णु की पूजा किया करती थी. जब वह बड़ी हुई तो उसका विवाह राक्षस राज जालंधर(शंखचूर्ण) से हो गया. जालंधर की उत्पत्ति भगवान शिव के रौद्र रूप के तेज़ से हुआ था. जब धरती उसका तेज़ सम्हालने में असक्षम रही तो उसे समुद्र के हवाले कर दिया गया इसलिए जालंधर को समुद्र पुत्र भी कहा जाता है. वृंदा अत्यंत ही पतिव्रता स्त्री थी. वह हमेशा अपने पति की सेवा किया करती थी.
एक बार जालंधर ने तीनों लोकों पर अधिकार की इक्षा लेकर सभी देवताओं पर आक्रमण कर दिया. इधर वृंदा ने अपने पति के सामने यह प्राण लिया की जब तक आप युद्ध से वापिस नहीं आएंगे तब तक मै आपकी सलामती के लिए भगवान विष्णु की पूजा करुँगी. वृंदा के व्रत का प्रभाव इतना अधिक था की कोई भी देवता जालंधर को हरा पाने में समर्थ नहीं थे. जब सभी देवता हारने लगे तो वे भगवान विष्णु के पास अपनी आप बीती सुनाने के लिए चले गए. 
सबकी बात सुनने के बा भगवान विष्णु ने कहा की वृंदा मेरी परम भक्त है, और उसकी भक्ति ही उसके पति की शक्ति बनकर उसकी रक्षा कर रही है. मै अपनी भक्त के साथ अन्याय नहीं होने दे सकता. 
जब हालत बिगड़ने लगे तो सभी देवताओं के बार बार आग्रह करने पर भगवान विष्णु जालंधर का रूप लेकर वृंदा के पास चले गए. भगवान विष्णु को ही अपना पति समझकर वृंदा अपनी व्रत से उठ गई. पूजा से उठते ही वृंदा का संकल्प टूट गया और देवताओं ने जालंधर को मार गिराया. जालंधर का कटा हुआ सर वृंदा के सामने जा गिरा. जालंधर का कटा सर देखते ही विष्णु भी अपने वास्तविक रूप में आ गए और शर्म के कारण बिना कुछ बोले सर झुककर वृंदा के सामने खड़े रहे. भगवान विष्णु को सर झुकाये खड़े देख वृंदा सबकुछ समझ गई और भगवान विष्णु को श्राप देकर पत्थर का बना दिया. अपने पति को पत्थर बना देख माँ लक्ष्मी ने वृंदा के सामे हाथ जोड़कर अपने पति को पहले जैसा बनाने की विनती करने लगी. लक्ष्मी का विलाप देखकर वृंदा ने विष्णु को पहले जैसा बना दिया और अपने पति का कटा सर लेकर सती हो गई. 
वृंदा के सती होने के बाद विष्णु ने उसके भस्म से एक वृक्ष उत्पन्न किया और उसे आशीर्वाद देते हुए कहा की वृंदा को इस संसार में युगों युगों तक तुलसी के नाम से जाना जाएगा और हर घर के आँगन में एक पवित्र वृक्ष के रूप में पूजा जाएगा. बिना तुलसी के मई भोग ग्रहण नहीं करूंगा और वृंदा के श्राप के प्रभाव से बना मेरा शिला(पत्थर) रूप शालिग्राम के नाम से जाना जायेगा जो हमेसा तुलसी के साथ मौजूद रहेगा. 
तभी से देवउठनी के दिन तुलसी का विवाह शालिग्राम के साथ कराया जाता है और उनकी पूजा की जाती है. 

जानिये कृष्ण ने महाभारत में अर्जुन से क्यों कहा की "मै ही ईश्वर हूँ"

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नमस्कार दोस्तों,
दोस्तों जब महाभारत युद्ध में अर्जुन अपने सामने स्वयं से युद्ध लड़ने आये अपने परिजनों को देखते हैं तो वे कमजोर पड़ जाते हैं और कहते हैं की इनसे युद्ध अगर मैं जीत भी गया तो अपनों के क़त्ल का इलज़ाम लेकर मैं कैसे खुस रह पाउँगा और कैसे जी पाउँगा. तब कृष्ण अर्जुन से कहते हैं की हे अर्जुन यह युद्ध तुम्हारे और तुम्हारे परिजनों के बीच नहीं बल्कि सही और गलत, धर्म और अधर्म के बीच है. तुम अपने परिजनों का नहीं बल्कि अधर्म करने वालों और अधर्मियों का साथ देने वालों का क़त्ल कर रहे हो. तुम्हारे मन में यह दुविधा नहीं होनी चाहिए जो तुम्हे कमज़ोर बना रहा है. कृष्ण ने कहा की सारे रिश्ते नाते मोह माया सब तुम्हारे इस शरीर से बंधे हैं. तुम इसलिए दुखी हो क्योंकि तुम स्वयं को केवल एक शरीर मान रहे हो. पर तुम केवल एक शरीर नहीं हो. तुम आत्मा हो जो की अनगिनत जन्मों से अनगिनत शरीर और नाम के साथ इस धरती में बार बार आते हो. तुम मुझ परमात्मा का अंश हो. हे अर्जुन “मैं ही ईश्वर हूँ”. ये तुम नहीं जानते पर मैं जानता हूँ. 
दोस्तों कृष्ण द्वारा कहे गए इस एक वाक्य “मैं ही ईश्वर हूँ” इसके पीछे बहोत ही गहरा arth छिपा हुआ है. जिसका आज आधी से अधिक दुनिया गलत मतलब निकाल बैठी है और कृष्ण के जीवन से ज्ञान लेने के बजाये उन्हें भगवान मानकर केवल उनकी भक्ति करके सारे तकलीफों से मुक्ति पाना चाहते हैं. यही वजह है की आस्तिक और धार्मिक व्यक्ति और अधिक दुखों और तकलीफों से घिर जाता है.
दोस्तों यह तो हम सभी जानते हैं की हिन्दू धर्म में भगवान विष्णु के अनेक अवतारों का जिक्र होता है पर केवल कृष्णा अवतार ही एक मात्रा ऐसा अवतार है जिसमे उन्होंने भागवत गीता का ज्ञान देते वक़्त उन्होंने स्वयं यह कहा की हे अर्जुन मई ही ईश्वर (भगवान) हूँ. पर यह बात मै जानता हूँ तुम या संसार में अन्य कोई नहीं. कृष्णा अवतार के अलावा अन्य किसी अवतार में उन्होंने ने अपने भगवान् होने की घोषणा नहीं की. पर क्या उनके द्वारा ऐसा कहे जाने का वही अर्थ है जो पूरी दुनिया समझती है और अब तक मानती आ रही है. 
आप सभी इस बात पर जरा ध्यान दीजिये की यदि वे भगवान है तो क्यों इस संसार में वही लोग सबसे ज्यादा दुखी हैं जो अपना अधिकतर समय पूजा पाठ में लगाते हैं और उनकी आराधना करते हैं. आज मै आपको कृष्ण द्वारा कहे इस वाक्य के पीछे का वास्तविक अर्थ बताने जा रहा हूँ. अगर मै कहूँ की यह इस संसार का वह रहस्य है जिसे इस पूरी श्रीष्टि में केवल कुछ ही लोग जान पाए हैं तो यह गलत नहीं होगा. इस रहस्य को जानने वाले चाँद लोगों के नाम मै आपको बता दूँ.
भगवान कृष्ण के अलावा इस रहस्य को हनुमान, रावण, एकलव्य और कर्ण ही ऐसे हैं जिन्होंने इस धरती पर इस रहस्य को जान लिया था. 
कृष्ण द्वारा कही गयी यह बात हमारे विश्वास का हमारे जीवन और सामर्थ्य पर पड़ने वाले प्रभाव को दर्शाता है. भगवान कृष्ण द्वारा इंसानों को दिया गया सबसे महत्वपूर्ण और अनेकों युगों तक काम आने वाला अचूक मंत्र या ज्ञान है ” अहं ब्रम्हास्मि” यह वह मंत्र है जिसे जो भी मनुष्य अपने पुरे विश्वास के साथ अपने जीवन आचरण में उतार लेता है उसे कोई भी उपलब्धि हासिल करने से संसार की कोई भी शक्ति रोक नहीं सकती.
दोस्तों अहं ब्रम्हास्मि या मै ही ईश्वर हूँ का वास्तविक अर्थ यह है की हमें जो जीवन मिला है उसके ईश्वर हम ही हैं. हमारे जन्म के बाद हमारे किसी भी कर्म और उसके परिणाम पर कोई अन्य शक्ति हस्तक्षेप नहीं करती. हमारे जीवन के अंत तक हम जो भी कर्म करते हैं और जो भी परिणाम भुगतते हैं उसके लिए केवल हम ही जिम
मेदार होते हैं. हम अपने विश्वास की शक्ति से अपने सामर्थ्य को इतना बढ़ा सकते हैं की हम स्वयं ही ईश्वर बन सकते हैं. हमारे मस्तिष्क का हम केवल १० प्रतिशत ही उपयोग कर पाते हैं. तो सोचिये जब हम अपने विश्वास की शक्ति से अपने बुद्धि का १०० प्रतिशत उपयोग कर पाएंगे तो क्या हम उस ईश्वर की दी हुयी सारी शांति हासिल नहीं कर पाएंगे. 
भगवान कृष्ण कहते हैं की यह श्रिस्ति मुझ से ही उत्पन्न हुयी है और मुझ में ही समां जायेगी. अर्थात यह श्रिस्ति पञ्चतत्वा से उत्पन्न हुयी है और मृत्यु के बाद उसी में समां जायेगी. सृजन से अंत तक के इस सफर के बीच यह श्रिस्ति केवल जीवों के विश्वास और जिज्ञासा के बदौलत इतना विकाश कर पायी है. 
अगर पानी में पनपे प्रारंभिक जिव के अंदर भूमि तक पहुंचने की जिज्ञासा और स्वयं पर विश्वास नहीं पनपता तो आज हम इस दुनिया में जीवों की अनगिनत प्रजातियां नहीं देख पाते. तो दोस्तों यह पूरी दुनिया का विकाश केवल विश्वास के आधार पर ही टिका है. और वह विश्वास है स्वयं का स्वयं के जीवन का ईश्वर होने का. जो भी व्यक्ति खुद को ही अपना ईश्वर मानकर आगे बढ़ता है उसे संसार की कोई भी शक्ति कामयाब होने से रोक नहीं सकती. 
आप सभी पाठकों को मेरा यह लेख कैसा लगा मुझे कमेंट करके बताएं. और मुझे फॉलो करना न भूलें. धन्यवाद्.